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AIR unaware of price hikes

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NK SINGH BHOPAL: The All India Radio authorities at Bhopal seem to be unaware of the sky-rocketing prices. To the utter dismay of the listeners, for the past few months, the prices of wheat have not been included in the food-grain price list daily broadcast by the Bhopal station of AIR. Though the Department of Economics and Statistics of the State Government supplies the wheat prices along with the prices of other commodities daily to the AIR, the latter find it more convenient to ignore them. The reason for this shut-your-eyes step is said to be the too-honest data' provided by the department. According to the figures available with the department, the prices of wheat in the 'open market' vary from Rs. 1.50 to Rs. 1.60 per kg. According to the rates fixed by the State Government -- which now controls the wheat trade right at the very beginning of the production pipe line -- it should not have crossed the Rs. 1 mark. Faced with this peculiar situation the AIR authorities w...

भाजपा: जोखिम भरा सियासी जुआ

BJP forms a minority government


NK SINGH


तीसरे मोर्चे के जोरदार हमले के मद्देनजर भाजपा की अल्पमत सरकार के लिए स्थितियां प्रतिकूल, बहुमत साबित करने के जिए पार्टी क्षेत्रीय दलों को मनाने में जुटी मगर कांग्रेस के एक धड़े का समर्थन हासिल किए बिना काम नहीं बनने वाला 


अब तक कांग्रेस और तीसरे मोर्चे के दलों को ही अवसरवादी ढंग से सत्ता हथियाने की संस्कृति का पयार्य माना जाता रहा है और भारतीय जनता पार्टी की छवि दार्घकालिक राजनैतिक विचारों के आधार पर चलने वाली पार्टी की रही है। सरकार बनने का भाजपा का विवादास्पद फैसला एक ऐसा राजनैतिक जुआ है जो उसने पहले कभी नहीं खेला।

आरंभ में अपने कार्यकर्ताओं और वरिष्ठतम नेताओं के जोर देने पर पार्टी ने इस उम्मीद में ‘करो या मरो‘ की नीति अपनाई कि करारी हार के बाद कांग्रेस में फूट पड़ जाएगी, हरदम अपनी खिचड़ी अलग-अलग पकाने वाला राष्ट्रीय मोर्चा और वामपंथी मोर्चा गुटबाजी की बीमारी से उबर नहीं पाएगा और नई-नई उभर रहीं अप्रतिबद्ध क्षेत्रीय ताकतें कभी भी एक मंच पर नहीं आ पाएंगी।

भाजपा ने उम्मीद की थी कि वह इस विभ्रम की स्थिति से भरपूर फायदा उठाएगी और अनुच्छेद 370 तथा समान नागरिक संहिता जैसे हिंदुत्ववादी मुद्दों पर अपनी नीति नरम करके कुछ धर्मनिरपेक्ष गुटों का भी समर्थन जुटा लेगी। केंद्र में अपनी सरकार होने का एक फायदा भाजपा को उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में मिल सकता है जहां इस साल के अंत से पहले विधानसभा चुनाव होने हैं।

मगर एच.डी. देवगौड़ा के तीसरे मोर्चे नेता चुने के बाद विपक्ष की अप्रत्याशित एकता और तीसरे मोर्चे को कांगे्रस के समर्थन की घोषणा के बाद भाजपा को लगा कि उसने बाधा का अंदाजा लगाए बिना ही छलांग मार दी है।

प्रधानमंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी के शपथ लेने के बाद तो भाजपा केा लगने लगा कि आगे कुआं और पीछे खाई है। अगर वह बहुमत साबित नहीं कर पाई तो उसकी छवि मलिन होगी और अगर वह सांसदों की खरीद-फरोख्त के जरिए सरकार बचाती है तो उस पर अनैतिकता का कलंक लग जाएगा जिससे पार्टी की खास पहचान को धक्का पहुंचेगा क्योंकि वह ऐसी पार्टी है जिसने परदे के पीछे की जोड़-तोड़ और लेन-देन से सत्ता पाने की तिकड़मों की जमकर सार्वजनिक आलोचना की है।

गौरतलब है कि 534 सदस्यीय लोकसभा में भाजपा और उसके सहयोगियों -- शिवसेना, समता पार्टी, हरियाणा विकास पार्टी और अकाली दल -- की तादाद सिर्फ 194 है।

ऐसे में विश्वास मत प्राप्त करने को नेतृत्व के राजनैतिक कौशल की अग्निपरीक्षा माना जा रहा है। विभिन्न विपक्षी पार्टियों के 320 से ज्यादा सांसदों के भाजपा विरोधी रूख के बावजूद बहुमत पाने की कोशिशों को जायज ठहराते हुए वाजपेयी ने कहा, ‘‘जनादेश कांग्रेस के खिलाफ है। और कमोबेश हमारे पक्ष में है।‘‘

सियासी पंडित वाजपेयी और उनके सहयोगियों के असाधारण आत्मविश्वास के कारणों का अनुमान लगाने में लगे हैं। रक्षा मंत्री और नई सरकार के एक प्रमुख कर्ताधर्ता प्रमोद महाजन कहते हैं, ‘‘पेप्सी, कोक ओर प्रमोद अपने फार्मूले कभी जाहिर नहीं करते।‘‘

पार्टी के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि अल्पमत के बावजूद सरकार बनाने का दावा पेश  करने का फैसला वाजपेयी ने ही किया था, हालांकि चुनाव से पहले उन्होंने घोषणा की थी कि अगर सहयोगियों समेत उनकी पार्टी को 215 के करीब सीटें नहीं मिलीं तो वे सरकार बनाने का दावा नहीं करेंगे।

वाजपेयी के अपनी बात से टलने की सफाई देते हुए भाजपा नेता कह रहे हैं कि जब राष्ट्रपति ने उन्हें आंमत्रित किया जब उन्हें यह खबर नहीं थी कि कांगे्रस देवगौड़ा के नेतृत्व वाले तीसरे मोर्चे को बिना शर्त समर्थन दे रही है।

भाजपा के महासचिव कुशाभाऊ ठाकरे कहते हैं, ‘‘उस दिन सुबह हम राष्ट्रपति की चिट्ठी और दूसरे घटनाक्रमों पर विचार करने के लिए जुटे थे। तब हमें पता नहीं था कि कांगे्रस ने तीसरे मोर्चे को बिना शर्त  समर्थन दिया है। हमें सूचना मिली थी कि कांगे्रस ने कठिन शर्तें रखी हैं।‘‘

कहा जाता है कि तीन वजहों से वाजपेयी ने सरकार बनाने के लिए जोखिम उठाने का फैसला कियाः देश भर के भाजपा कार्यकर्ताओं का सरकार बनाने का दबाव; औद्योगिक समूहों का समर्थन, जो रामो-वामो की सरकार बनने को लेकर चिंतित थे; और आरएसएस का प्रोत्साहन।

राजेंद्र सिंह और एच.वी. शेषाद्री जैसे संघ के शीर्षस्थ नेता चुनाव नतीजे आना शुरू होते ही राजनैतिक स्थिति के विष्लेषण के लिए दिल्ली में मिले। इन नेताओं ने न सिर्फ भाजपा के गठबंधन सरकार बनाने की संभावनाएं तलाशने पर सहमति जताई बल्कि पार्टी नेताओं के इस सुझाव को भी माना कि सरकार बनाने की खातिर राम मंदिर, अनुच्छेद 370 और समान नागरिक संहिता जैसे विवादास्पद मुद्दों पर फिलहाल जोर न दिया जाए।

सरकार बचाने की भाजपा की रणनीति सीधी-सादी है। दूसरे दलों में फूट डालने और दल-बदल कराने के अलावा विश्वास मत के समय विपक्षी सदस्यों को अनुपस्थित रहने के लिए राजी करना। महाजन, जसवंत सिंह और राजस्थान के मुख्यमंत्री भैरों सिंह शेखावत ने ही इस मुश्किल काम को अंजाम देने की जिम्मेदारी ली है। वे विभिन्न क्षेत्रीय दलों से संपर्क साध रहे हैं, जिनकी 11वीं लोकसभा में अच्छी-खासी हिस्सेदारी है । शेखावत अपने राज्य के इंका सांसदों के अलावा कांग्रेस (ति) के सांसदों से भी बातचीत कर रहे हैं और जसवंत सिंह क्षेत्रीय दलों के बड़े नेताओं से बातचीत जारी रखे हुए हैं।

बहुत से भाजपा नेता आश्वस्त हैं - ओैर तीसरे मोर्चे के नेता आशंकित - कि वाजपेयी और पी.वी. नरसिंह राव के बीच कोई पोशीदा समझौता है और सरकार बच जाएगी क्योंकि कांग्रेस या कम-से-कम इसका एक हिस्सा विश्वास मत के समय सदन से अनुपस्थित रहेगा।

करीब साल भर पहले उत्तर प्रदेश में बसपा सरकार को भाजपा के समर्थन देने के बाद वाजपेयी ने कहा था कि  राजकाज विचारधारा से अलग होता है। उन्होंने कहा था, ‘‘कभी-कभी विरोधी को भी साथ लेकर चलना पड़ता है।‘‘

16 मई को शपथ ग्रहण करने के तुरंत बाद कांगे्रस के समर्थन देने के बारे में जब पत्रकारों ने उनसे पूछा तो अपने पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री राव, जो उनके बगल में ही खड़े थे, की ओर इशारा करते हुए उनका जवाब था, ‘‘राव साहब से पूछिए।‘‘ राव ने बचते हुए कहा, ‘‘आप लोग वाजपेयी से पूछिए। आज के दूल्हे वे ही हैं।‘‘

इस तरह की बातचीत से अटकलें लगाई जाने लगीं और इन अटकलों में तब और तेजी आई जब 17 मई को वाजपेयी और आडवाणी ने राव से भेंट की। सूत्रों ने इसे एक सामान्य बैठक बताया जिसमें राव ने अपने उत्तराधिकारी को सरकारी कामकाज की जानकारियां दीं।

लेकिन आडवाणी के वहां होने से अफवाहों को ही हवा मिली। इन अफवाहों को इस बात से भी बल मिला कि भाजपा ने अपनी अल्पमत सरकार को कांगे्रस के समर्थन के बदले में 10वीं लोकसभा के अध्यक्ष शिवराज पाटील को दोबारा चुनने का प्रस्ताव रखा है।

क्षेत्रीय पार्टियों से समर्थन मिलने की संभावना बहुत कम दिखती है क्योंकि वे तीसरे मोर्चे की मुख्य घटक हैं। मगर कुछ भाजपा नेताओं का मानना है कि बहुत सारी छोटी पार्टियां आसानी से मान जाएंगी, कुछ हद तक तो अपने कांग्रेस विरोधी रूख के चलते क्योंकि इनमें से कई पार्टिया तो इसी वजह से अस्तित्व में आई।

और फिर सत्ता का चुग्गा भी काम आएगा। हालांकि वाजपेयी ने बहुत जोर देकर कहा है कि उनकी पार्टी सांसदों की खरीद-फरोख्त नहीं करेगी मगर वे विपक्ष के सांसदों को लुभाने के लिए गठबंधन वाली सरकार के स्वरूप् पर जोर दे रहे हैं और कह रहे हैं कि उनका विश्वास आम सहमति की राजनीति में है।

अगर यह दांव कारगर रहता है और भाजपा क्षेत्रीय दलों का समर्थन पाने में कामयाब रहती है तो वह 266 के जादुई आंकड़े को पार कर सकती है।

कुछ भाजपा नेताओं की मनाने-समझाने की क्षमता  के बावजूद पार्टी के कर्ताधर्ता कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि अगर पार्टी को लगा कि वह विश्वास मत नहीं जीत पाएगी तो संघ राम मंदिर और अनुच्छेद 370 खत्म करने के मुद्दों को लेकर देश भर में आंदोलन छेड़ देगा। और इस तरह भाजपा को हिंदुत्व के लिए सत्ता कुर्बान करने वाले दल को रूप में प्रचाारित कर साख पर बट्टा लगने से बचा लेगा।

ज्यादातर कांग्रेसी सांसद राव के साथ ही हैं क्योंकि अब भी इस बात की संभावना है कि भाजपा अगर बहुमत साबित नहीं कर पाई तो राव सत्ता में लौट सकते हैं। और फिर जिस तरह राष्ट्रपति ने सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते वाजपेयी को बुलाया उसी तरह वे भाजपा के नाकाम रहने पर दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को आमंत्रित कर सकते हैं।

ऐसी हालत में राव तीसरे मोर्चे के नेताओं से कह सकते हैं कि चूंकि राष्ट्रपति ने कांगे्रस को सरकार बनाने के लिए चुना है, सो उन्हें कांगे्रस को उसी तरह बिना शर्त समर्थन देना चाहिए जैसे उनकी पार्टी ने भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए धर्मनिरपेक्षता के हित में देवगौड़ा का समर्थन किया था। कांग्रेस ने पहले ही तीसरे मोर्चे के नेताओं से कह दिया है कि अगर वे केंद्र से भाजपा सरकार को दूर रखना चाहते हैं तो कांगे्रस नेतृत्व के बारे में उनकी कोई शर्त नहीं होनी चाहिए।

कई कांग्रेसियों को आशंका है कि राव अपना विचार बदल सकते हैं। यह आशंका खासकर के. करूणाकरन और राजेश पायलट सरीखे राव के कट्टर आलोचकों और राव को दोबारा सत्ता में देखने के अनिच्छुक पार्टी नेताओं में गहरे पैठ गई है।

इस आशंका को भाजपा बहुत कायदे से भुना रही है और उसे उम्मीद है कि राव-विरोधी खेमा अपना लक्ष्य हासिल करने के चक्कर में भाजपा को सत्ता में बनाए रखने में मदद कर सकता है। पर भुवनेश चतुर्वेदी, एस.एस. अहलूवालिया, सुरेश पचौरी, विनोद शर्मा और दूसरे युवा सांसद मंत्री पद के लालच में राव की मदद करेंगे।

विश्वास मत से पहले कांगे्रस के 46 सांसदों को लुभाकर अपने पक्ष में लाने की भाजपा की चाल कामयाब होती नहीं दिखती। विश्वास मत से पहले कांगे्रस में बंटवारे की संभावना बहुत कम है क्योंकि पायलट जैसे तथाकथित राव विरोधी अब भी खुले तौर पर कह रहे हैं, ‘‘किसी भी कीमत पर भाजपा से किसी तरह के संबंध का सवाल नहीं उठता।‘‘

दूसरी ओर, तीसरा मोर्चा पूरी तरह से संघर्ष करने के मूड में है। 179 सांसदों वाले इस मोर्चे को एक-एक सांसद वाली छह पार्टियों का समर्थन हासिल है। उसने कांग्रेस से तालमेल बिठाकर काम करने की रणनीति बनाई है। उसने अपने सांसदों को सुरक्षित रखने के लिए 14 सदस्यीय निगरानी समिति बनाई है और खबर है कि इन सांसदों को ऐसे सुरक्षित ठिकानों पर रखा गया है जहां उन्हें कोई लालच न दे पाए।

भाजपा के सुनहरे मौके को छीनने के प्रयासों के पीछे उनकी अपनी वजहें हैं । द्रमुक और तेलुगुदेशम (नायडू) दोनों को भाषा के मुद्दे पर भाजपा की नीयत को लेकर संदेह है। उन्हें लगता है कि पार्टी दक्षिण पर  हिंदी थोप देगी। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू कहते हैं, ‘‘हम केवल उनकी सांप्रदायिक नीतियों के ही खिलाफ नहीं हैं।‘‘

उधर, जद को आशंका है कि भाजपा उसकी राज्य सरकारों, खासकर बिहार में लालू सरकार को भंग कर सकती है जहां उसने इन चुनावों में काफी जड़ें जमा ली हैं। जद नेता श्रीकांत जेना का कहना है, ‘‘उन्हें बिहार में स्थिति का पता लग गया और वे लालू प्रसाद यादव द्वारा अपनी पकड़ फिर से मजबूत करने से पहले ही अपनी कामयाबी को स्थायी कर लेना चाहेंगे।‘‘

उत्तर प्रदेश में भाजपा के विरूद्ध लड़ाई में सबसे आगे रहने वाले मुलायम सिंह यादव के लिए केंद्र में भाजपा सरकार का मतलब दुःस्वप्न जैसा है। इसी साल वहां विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और वे भाजपा को केंद्र में सरकार होने का फायदा नहीं उठाने देना चाहेंगे।

व्यापक नजरिए से देखें तो अभी-अभी राष्ट्रीय महत्व हासिल करने वाली क्षेत्रीय पार्टियां अपनी हैसियत को यूं ही गंवा देना नहीं चाहेंगी। वे भाजपा सरकार गिराने की भरसक कोशिश करेंगी क्योंकि उन्हें डर है कि यह पार्टी मध्यवर्ग और निम्नमध्य वर्ग को रिझाने के लिए कुछ लोक-लुभावन कदम उठाएगी। अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए पाकिस्तान से रस्साकसी करेगी या फिर कोई और नाटकीय चाल चलेगी।

जद के प्रवक्ता जयपाल रेड्डी कहते हैैं, ‘‘चूंकि वे वोट बटोरने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं, सो वे परमाणु बम के पक्ष में भी जा सकते हैं।‘‘

पर फिलहाल भाजपा ऐसे किसी पराक्रम के मूड में नहीं दिखती। सभी विवादास्पद मुद्दों को ठंडे बस्ते में डालने की उसकी मंशा  भी स्पष्ट हो गई। पार्टी के उपाध्यक्ष सुंदर सिंह भंडारी कहते हैं, ‘‘यह भाजपा की नहीं बल्कि साझा सरकार है। इसका अर्थ यह है कि न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर सहमति।‘‘

पर भाजपा के कुछ लोगों और आरएसएस-विहिप के कट्टरपंथियों को इस तरह के समझौते की जरूरत पर शक होने लगा है और असहमति के स्वर सुनाई देने लगे हैं। उनका तर्क है कि इस तरह के समझौतों से भाजपा की धार कुंद हो जाएगी।

पिछले पखवाड़े, भाजपा का आत्मविश्वास बढ़ने के साथ ही उसके चौकन्ना रहने की भी वजहें थीं। उसे 40 सीटें ज्यादा भले ही मिलीं पर उसके वोटों में कोई खास वृद्धि नहीं हुई है। कांग्रेस को भाजपा से 5 फीसदी ज्यादा वोट मिले हैं जबकि आठ राज्यों में सत्तासीन तीसरे मोर्चे का समर्थन देश भर में है।

भाजपा शासित प्रदेशों की सड़कों पर उसके कार्यकर्ता केंद्र में अपनी पार्टी की पहली सरकार बनने का जश्न अब भी मना रहे हैं। आडवाणी ने कहा, ‘‘यदि हम सिर्फ अपने मतलब से ही सोचते तो भाजपा विपक्ष में बैठने का फैसला कर सकती थी। वह हमारे लिए सुविधाजनक होता। पर वैसा करने से जल्दी चुनाव कराने की नौबत आती।‘‘

हकीकत तो यही है कि अल्पमत सरकार बनाकर भाजपा ने विभ्रम और अनिश्चितता बढ़ाने का ही काम किया है। वाजपेयी जोड़-तोड़ करने वाले नेता नहीं माने जाते पर अपनी सरकार को बरकरार रखने के लिए उन्हें यह गुर सीखना होगा।

-साथ में जफर आगा और जावेद एम. अंसारी


भाजपा की रणनीेति

अकाली दल, समता पार्टी और हविपा जैसी पार्टियों को साझा सरकार में शामिल करने के लिए हिंदुत्व को ठंडे बस्ते में डालना।

अपने कांगे्रसी ‘दोस्तों‘ को विश्वास मत के दौरान अनुपस्थित रहने के लिए मनाना; पार्टी तोड़ने के लिए ‘ईमानदार कांगे्रसियों‘ की तलाश. बसपा के साथ समझौते को पुनर्जीवित करना।

द्रमुक, तमिल मणिल कांग्रेस, तेलुगुदेशम और अगप जैसी क्षेत्रीय पार्टियों को गैर-कांग्रेसवाद की दुहाई देकर साथ लाना। इसमें कामयाबी न मिले तो मंत्री पद का लालच देकर उनमें फूट डालना।

कांग्रेस (ति) जैसी पार्टियों में फूट डालना। निर्दलीय सांसदों और इकलौते सांसद वाली पार्टियों को टटोलना जिनकी तादाद 19 है।

यह सब काम न आए तो राम मंदिर और समान नागरिक संहिता जैसे विवादास्पद मुद्दों को देश भर में उछालने के लिए भगवा ब्रिगेड को सक्रिय करना। यह प्रचारित करना कि भाजपा ने हिंदुत्व एजेंडा की खातिर अपनी सरकार की बलि चढ़ा दी।

भाजपा को यह करना होगा

भाजपा गठबंधन से बाहर 340 सांसद हैं और विश्वास मत हासिल करने के लिए उसे 72 और सांसदों का समर्थन चाहिए। इसलिए क्षेत्रीय पार्टियों को मनाने के अलावा उसे कांगे्रस में फूट डालनी पडे़गी या उससे समझौता करना होगा।

India Today (Hindi) 31 May 1996

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